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कठोर बनो कमजोर नहीं Be tough hindi story

      नोट - 1-"वीडियो देखने के स्थान पर पढ़ने से आपके मस्तिक का विकास अधिक तेज़ी से होता है। " 
                 2-"ये एक रुसी  है जिसको हिंदी भाषा में रूपांतरित किया गया है।   

         मैंने अपने बच्चों की आया सरला को अपने पढ़ने के कमरे में बुलाया और कहा, "सरला बैठो। मैं तुम्हारे वेतन का हिसाब करना चाहता हूँ। 

          मेरे ख्याल  से तुम्हें पैसों की आवश्यकता होगी जितना की मैं तुम्हें अब तक समझ सका हूँ , मूझे लगता है, तुम अपने-आप कभी अपने पैसे नहीं माँगोगी। इसलिए मैं खुद ही तुम्हारा हिसाब करना चाहता हूँ। हाँ, तो तुम्हारा वेतन तीन हजार रुपये महीना तय हुआ था न***?"

          "जी नहीं, चार हजार रुपये,"सरला ने झिझकते हुए कहा। " नहीं बहन, तीन हजार।  मैंने  डायरी में लिख रखा है। मैं बच्चों की आया को हमेसा तीन हजार रुपये महीना ही देता आया हूँ। अच्छा *** तो तुम्हे हमारे यहाँ काम करते हुए दो महीने हुए हैं ***"  
          " जी नहीं , दो महीने पांच दिन। "

          "क्या कह रही हो ! ठीक दो महीने हुए हैं। बहन , मैंने डायरी में सब- कुछ लिख रखा है। तो दो महीने के बनते है। 



          छ: हजार रुपये।  लेकिन छ: हजार रुपये तभी बनेगे जब महीने में एक भी अनुपस्थिति न हो।  तुमने रविवार को छुट्टी की है। उस दिन तुमने काम नहीं किया हैं। सिर्फ मधु को बहार ले गई हो।  इसके अलावा तुमने इस महीने में तीन छुट्टियाँ और ली हैं ***"


           सरला का चेहरा पीला पड़  गया। वह बार-बार अपनी ड्रेस की सिकुड़ने दूर करने लगी। और बोली एक शब्द भी नहीं। 

          "हाँ , तो नौ इतवार और तीन छुट्टियाँ ***यानी बारह दिन काम नहीं हुआ।  मतलब यह कि तुम्हारे बारह सौ रुपये कट गए। उधर मधु चार दिन बीमार रही और तुमने सिर्फ मोनू को ही पढ़ाया। 

          पिछले हफ्ते  शायद तीन दिन तुम्हारे दाँतों में दर्द हो रहा था और मेरी बीवी ने तुम्हे दोपहर के बाद छुट्टी दे दी थी।तो बारह और सात हुए उन्नीस। उन्नीस नागे ! हाँ, तो बहन घटाओ साठ में से उन्नीस *** कितने बचे ? ***इकतालीस ***इकतालीस सौ रुपये। ठीक हैं न ?"

         सरला की आँखों में आंसू छलक आए। उसने धीरे से अपना गला साफ़ किया। और बोली एक शब्द नहीं। 

          " हाँ , याद आया ," मैंने डायरी देखते हुए कहा, "पहली जनवरी को तुमने चाय की प्लेट और प्याली तोड़ी थी। प्याली बहुत कीमती थी। 

          मगर मेरे भाग्य में तो हमेशा नुकसान उठाना ही लिखा है। चलो , में उसके दो सौ रुपये कम कर देता हूँ। अब देखो , उस दिन तुमने ध्यान नहीं रखा और तुम्हारी नज़र बचाकर मधु पेड़ पर चढ़ गयी और वहाँ खरोंच लगकर उसकी जैकेट फट गई।  दस सौ रुपये  उसके कट गए। 

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        "इस तरह तुम्हारी लापरवाही के चलते नौकरानी ने मोनू के जुते चुरा लिए *** अब देखो बहन तुम्हारा काम बच्चो की देखभाल है। तुम्हें इसी के तो  पैसे मिलते हैं। 

  व        तुम अपने काम सही से नहीं करोगी, तो पैसे काटेंगे या नहीं ? मैं ठीक कह रहा हुँ न ?*** तो मोनू के जुतों के लिए पांच सौ रुपये और कट गए। *** और हाँ, दस जनवरी को मैंने तुम्हें दस सौं रुपये दिए थे ***"

          "जी नहीं, आपने मुझे कुछ नहीं ***" सरला ने दबी ज़बान से कहना चाहा। 

        "अरे बहन, मैं क्या झूठ बोल रहा हूँ ? मैं डायरी में हर चीज़  लिख लेता हूँ। तुम्हें यकीन न हो तो दिखाऊँ डायरी ?"

          "जी नहीं। आप कह रहे हैं, तो आपने दिए ही होंगे। "

         "दिए होंगे नहीं, मैंने दिए हैं, " मैंने कठोर स्वर में कहा, "तो ठीक है घटाइए सत्ताईस, इकतालीस में से ***बचे चौदह। ***क्यों हिसाब ठीक है न ?"

         उसकी आँखें आँसुओं से भर उठीं। उसके तमाम शरीर पर पसीना छलछला आया।  काँपती आवाज़ में वह बोली,"मुझे अभी तक एक ही बार कुछ पैसे मिले थे और वे भी अपनी पत्नी ने दिए थे। सिर्फ़ तीन सौं रुपयें।  ज़्यादा नहीं। "

          "अच्छा !" मैंने स्वर में आश्चर्य भरकर कहा, "और इतनी बड़ी बात तुम्हारी मालकिन ने मुझे बताई तक नहीं। देखो, हो जाता न अनर्थ ! खैर, मैं इस भी डायरी में लिख लेता हूँ। हाँ, तो, चौदह में से वे तीन और घटा दो। बचते हैं ग्यारह सौं रुपयें। तो बहन, ये रही तुम्हारी तनख्वाह *** ये ग्यारह सौं रुपयें देख लो ठीक  हैं  न?"

         उसने कांपते हाथों से ग्यारह सौं रुपये लिए और अपनी जेब टटोलकर किसी तरह उन्हें उसमें रख लिया और धीमे विनीत स्वर में बोली, "जी, धन्यवाद !"

         मैं गुस्से से उबलने लगा।  कमरे में चक्कर लगाते हुए मैंने क्रोधित स्वर में कहा, "धन्यवाद, धन्यवाद किस बात का ?"

         " आपने मुझे पैसे दिए, इसके लिए धन्यवाद। "

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         अब मुझसे नहीं सहा गया। मैंने ऊँचे स्वर में, लगभग चीखते हुए कहा, "तुम मुझे धन्यवाद दे रही हो जबकि तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैंने तुम्हारे साथ धोखा किया है। तुम्हें ठग लिया है। तुम्हारे पैसे मार लिए हैं *** इसके बावजूद तुम मुझे धन्यवाद दे रही हो ?"

          "जी हाँ ! यहाँ से पहले मैंने जहाँ -जहाँ काम किया, उन लोगों ने तो मुझे एक पैसा तक नहीं दिया। आप मुझे कुछ तो दे रहे हैं। "उसने मेरे क्रोध पर ठंडे पानी का छींटा-सा मरते हुए कहा। 

           "उन लोगों ने तुम्हें एक पैसा भी नहीं दिया ! सरला, मुझे यह बात सुनकर तनिक भी आश्चर्य नहीं हो रहा है। "मैंने कहा। फिर थोड़ा स्वर धीमा करके मैं बोला, "सरला मुझे इस बात के लिए माफ़ कर देना कि मैंने तुम्हारे साथ एक छोटा-सा क्रूर मज़ाक किया। पर मैं तुम्हे समझना चाहता था।  देखो सरला, मैं तुम्हारा एक पैसा भी नहीं मारुंगा। देखो, ये तुम्हारे आठ हजार रूपये रखे हैं। 

           मैं अभी इन्हें तुम्हें दूंगा। लेकिन उससे पहले मैं तुमसे कुछ पूछना चाहूंगा। सरला, क्या ज़रूरी है, कि इन्सान भला कहलाए जाने के लिए इतना दब्बू , डरपोक और बोदा बन जाए ? नहीं, सरला, नहीं।इस तरह खामोश रहने से काम नहीं चलेगा।

          अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए तुम्हें इस कठोर, निर्मम और ह्रदयहीन संसार का सामना करना होगा। अपने दांतों और पंजों के साथ लड़ना होगा, पूरी शक्ति के साथ। 
          सरला यह मत भूलो कि इस संसार में दब्बू , डरपोक और बोदे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है *** कोई जगह नहीं है ***"

                अकबर बीरबल की कहानी  

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