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निर्णय Decision hindi story

        चार ब्राह्मण hindi story 
 नोट - "वीडियो देखने के स्थान पर पढ़ने से आपके मस्तिक का विकास अधिक तेज़ी से होता है। " 
फैसला          एक गाँव में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें गहरी मित्रता थी। बेचारे सभी गरीब थे। न घर में खाने को अन्न था। और न पहनने को अच्छे कपड़े। धनाभाव के कारण उनका जीवन बहुत कष्टमय था।  


       घर- परिवार व रिश्तेदार भी उन्हें नहीं पूछते थे। चारों की आपस में बैठकर अपने सुख-दुःख की बातें कर रहे थे। एक बोला, "मित्रो ! हमारा जीवन भी कोई जीवन है ! ऐसे जीवन को सौ बार धिक्कार है। "

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         दूसरा बोला, "मित्र ! तुम ठीक कहते हो। मैं तो समझता हूँ कि निर्धन बनकर संबंधियों में रहने से तो दूर शेर - हाथियों से भरे, काँटों से पूर्ण निर्जन वन में रहना,तिनकों पर सोना और वृक्षों की छाल  पहनकर समय बिताना कहीं अच्छा हैं। "

          तीसरा बोला, " मित्रो !मैं भी यही अनुभव कर रहा हूँ कि जिसके पास धन नहीं होता, उसे अपने लोग व सम्बन्धी सभी छोड़ देते हैं, उसके गुणों का मान नहीं करता, पुत्र भी उससे रूठ जाते हैं, और सब ओर से उसे संकट ही संकट घेर लेते हैं। 

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          मैं क्या बताऊँ? मनुष्य कितना ही शूरवीर, सुन्दर, वाक्पटु और शस्त्र और शास्त्र का पूरा पंडित क्यों  न हो, यदि उसके पास धन नहीं है, तो न उसे कोई मान देता है और न ही उसका यश फैलता है। "

             चौथे ने कहा, "मित्रो ! तुम्हें पता है कि जब मेरे पास धन था, तो सभी सगे - सम्बन्धी मेरे पास उठते- बैठते थे। परन्तु आज कोई पास फटकने का नाम तक नहीं लेता। क्या मेरे मस्तिष्क में वैसी बुद्धि नहीं है ? क्या मैं वैसे नहीं बोल सकता ? 

          मित्रो ! ये सब बातें तो पहले जैसी ही हैं, परन्तु धन- दौलत की गर्मी मेरे पास से निकल गई है।  यही कारण है कि आज मैं एक विचित्र- सा प्राणी बन गया हूँ। आज उन सबने मुझे छोड़ दिया है। 

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          "इस प्रकार सबने अपना - अपना दुखड़ा रोया और अंत में उन चारों ने गांव से दूर कहीं विदेश जाकर धन कमाने का निश्चय किया। 

          अगले दिन प्रातः ही वे चारों अपने अपने घरबार छोड़कर धन कमाने की इच्छा से सुदूर देश को चल दिए।  कई दिन तक निरंतर चलने के बाद वे अवन्ति नाम की नगरी में पहुँचे। 

           अवन्ति शिप्रा नदी के तट पर बसी हुई एक सुन्दर  नगरी है। उन्होने शिप्रा नदी में स्नान किया।  जैसे ही नहाकर वे जल से बहार निकले, वैसे ही अपने पास खड़े एक ब्राह्मण को झुककर प्रणाम किया और उसका परिचय पूछा। 

             उसने बताया कि वह भैरवानंद नाम का योगी है और पास की ही एक कुटिया में रहता है। इसके बाद वे भी उसके साथ ही कुटिया में जा पहुचें। कुटिया में पहुंचकर योगी भैरवनंद ने उनसे पुछा, "आप लोग कहाँ से आ रहे हैं, कहाँ जाएँगे और किस लिए आपने घर छोड़ा है ?"

            उन्होंने उत्तर दिया,"भगवन ! हम ऐसी सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा से घर से निकले हैं कि जिससे या तो हम वहां पहुँचेंगे  जहां धन की प्राप्ति होगी या मरकर प्राण गँवा देगें। यही हमारा दृढनिश्चय है। 

           महाराज ! क्या आप हमें धन - प्राप्ति का कोई उपाय बता सकेंगे? हम सब-कुछ करने को तैयार हैं। हमें आपकी कृपा की पूर्ण आशा है। "

             जब भैरवानन्द ने देखा कि ये चारों मित्र बड़े साहसी हैं और प्राण तक देने को तैयार हैं, तो उसने जादू वाली चार बत्तियॉँ बनाकर प्रत्येक को एक -एक दे दी और कहा, "तुम सभी हिमायल की ओर चल पड़ो। 

           वहाँ जाते हुए जहाँ -जहाँ तुम्हारी बत्ती गिरेगी, वहाँ -वहाँ तुम्हें खजाना अवश्य प्राप्त होगा। वहाँ गड्ढा खोदकर उसमें से जो कुछ मिले उसे लेकर अपने - अपने घर चले जाना। "

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              भैरवानन्द के ऐसा कहने पर वे सब उसे प्रणाम करके हिमायल की ओर चल पड़े। चलते -चलते एक के हाथ से बत्ती गिर गई। उसके बाद ज्यों ही उसने वह स्थान खोदा, त्यों ही तांबे से भरी हुई भूमि को देखा। 

           वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपने मित्रों से कहा, "मित्रों ! अपनी -अपनी इच्छा के अनुसार सभी ताँबा ले लो और घर की ओर लौट चलो। "

              दूसरे बोले, अरे मुर्ख ! ताँबा भी कोई धन है ? यदि ढेर - भी हम ले जायेंगे तो भी गरीबी दूर नहीं होगी। अतः उठो , आगे चलो। "

              वह बोला, "आप लोग जाइए।  मैं तो आगे नहीं जाऊँगा। " यह कहकर वह ताँबा लेकर ही घर लौट गया और शेष मित्र आगे चल पड़े। 

              कुछ दूर जाने पर दूसरे मित्र के हाथ से बत्ती गिर गइ। उसने वहीं भूमि को खोदा, तो उसे चाँदी मिली।  प्रसन्न होकर वह बोला, "मित्रो ! देखो यह चाँदी है।  इसे लेकर घर लौटे चलो "

             बाकी बचे हुए दोनों मित्र बोले, "पहले तो ताँबे वाली भूमि मिली और अब चाँदी वाली। हमें आशा है कि आगे सोने वाली भूमि मिलेगी। चाँदी चाहे कितनी भी ले चलें, गरीबी दूर नहीं होगी। 

          अतः हम तो आगे चलेंगे। " यह कहकर वे आगे चल पड़े।  दूसरा मित्र जितनी चाँदी उठा सकता था। उठाकर घर की ओर चल दिया। 

           इधर वे दोनों मित्र आगे - आगे बढ़े जा रहे थे। जाते - जाते तीसरे मित्र के हाथ से भी बत्ती गिर गई। बत्ती के गिरते ही उसने प्रसन्न हो कर भूमि को खोदा तो क्या देखता है कि सारी भूमि सोने से भरी पड़ी है। 
          उसने झट दूसरे मित्र को बुलाते हुए कहा , " मित्र ! इधर देखो, कितनी बढ़िया खजाना निकला है। सोना ही सोना भरा पड़ा है। सोना काफ़ी मूल्यवान धातु हैं। अतः आओ, यहाँ से अपनी इच्छानुसार सोना बाँध लें और घर लौट चलें। "

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           चौथा मित्र हंसकर बोला , " अरे  मुर्ख ! तुझे कुछ भी पता नहीं।  देख, पहले तो ताँबा मिला, फिर चाँदी मिली और अब  सोना मिला है। इसलिए इसके बाद ही ऐसे रत्न मिलेंगे।  जिसमें से एक ही रत्न सारी दरिद्रता को नष्ट कर देगा। तो उठ, आगे चलें।  सोने का भार भी उठा लेने से भला क्या बनेगा ?" 

             उसने कहा, " मित्र, तुम जाओ। मैं नहीं जाऊँगा। मैं यहीं बैठा तुम्हारी प्रतीक्षा करुँगा। "

          तब चौथा मित्र अकेला ही चल पड़ा। मार्ग में कड़कती धूप पड़ रही थी। वह प्यास से व्याकुल हो रहा था, परन्तु दूर - दूर तक पानी का नाम तक नहीं था। उसे पीने के लिए कुछ भी प्राप्त न हुआ और इधर - उधर भटकता रहा। 

          घूमते -घूमते उसने देखा कि एक व्यक्ति मैदान में बैठा है। उसका सारा शरीर खून से लथपथ है और उसके सिर पर एक चक्र घूम रहा है। वह उसकी ओर बढ़ा और पूछने लगा, " भाई, आप कौन हैं ? आपके सिर पर चक्र इस प्रकार क्यों घूम रहा है ? 

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          कृपया मुझे बताइए कि क्या कहीं आस - पास पानी मिल सकेगा ? मैं बहुत प्यासा हूँ। " वह इस प्रकार कह ही रहा था कि उसके सिर का चक्र उछलकर उस ब्राह्मण ले सिर पर जा चढ़ा। चक्र के आते ही व्याकुल होकर उसने पूछा, "भाई !यह क्या हुआ है ? "

           उसने कहा, "मेरे सिर पर भी यह चक्र ऐसी प्रकार आया था। "

           ब्राह्मण ने पूछा,"भला बताओ तो सही कि यह कब उतरेगा ? मुझे बहुत पीड़ा हो रही है। "

          उसने कहा, "जब कोई व्यक्ति ऐसी प्रकार बत्ती लेकर धन की इच्छा से यहां आएगा और तुमसे इस चक्र के बारे में पूछेगा, तब यह चक्र उसके सिर पर जा चढ़ेगा और तुमको छुटकारा मिल जाएगा। "

          ब्राह्मण ने पूछा,"तुम्हें इस दशा में रहते हुए कितना समय बीत चुका है ?"

         उसने कहा, " मुझे एक हज़ार वर्ष से भी अधिक समय हो चुका है। जब मैं इस स्थान पर आया था, तब यहाँ बैठे किसी व्यक्ति के सिर से चक्र उतरकर मेरे सिर पर आ चढ़ा था। "

         इसके साथ ही उसने यह भी बताया, "यह चक्र कुबेर द्वारा नियुक्त है। जो भी मनुष्य धन के लोभ से यहाँ पहुँचता है , यह उसे घेर लेता है। इस भय से लोग यहाँ नहीं आते। 

          यह चक्र जिसके सिर पर रहता है, न उसे भूख लगती है, न प्यास, न वह बूढ़ा होता है और न ही उसकी मृत्यु होती है। केवल उसके सिर में पीड़ा होती रहती है और चक्र घूमता रहता है। " यह कहकर वह अपने  देश चला गया। 

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          मार्ग में उसे उसका मित्र , सोना कमाने वाला ब्राह्मण मिला। उसके पूछने पर घर जाने वाले ने बता दिया की उसका मित्र चक्र की पीड़ा में है। यहाँ सुन कर तीसरा ब्राह्मण अपने दुखी मित्र के पास गया और उसे इस दशा में देख केर बहुत दुखी हुआ। 

          अंत में उसने कहा," मित्र , मैने तुम्हे पहले ही कहा था  सोना लेकर वापस चलो , परंतु तुमने मेरी एक न सुनी और अधिक लोभ करके इधर चले आये। अच्छा , अब अपने घर के लिए कोई सन्देश दो।"

          चकर्धर ने कहा,"मेरे घर जा कर मेरी कहानी सुना देना और उन्हें कहना --

                                लोभ अधिक मत कीजिये,अधिक लोभ दुःख -खान। 
                                अधिक लोभ से शीश पर, चलता चक्र महान।।"         

                                अकबर बीरबल की कहानी  

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