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महाराजा रणजीत सिंह

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महाराजा रणजीत सिंह

महाराजा रणजीत सिंह अपनी प्रजा के सुख-दुख का बड़ा ध्यान रखते थे। वे अधिकारियों की सुनी सुनाई बातों पर ही विश्वास करके संतुष्ट नहीं हो जाते थे। वह वेश बदलकर घूमते और प्रजा की कठिनाइयों की जानकारी प्राप्त करते थे।
महाराजा 1 दिन बेकारी के वेश में घूम रहे थे। रात का समय था उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा असहाय व्यक्ति एक भारी थैला रखे बैठा है। उन्हें लगा इसे कोई कठिनाई है। महाराजा ने उस से जानना चाहा कि उसे क्या परेशानी है। वह बुढा भला भिकारी के वेष में महाराजा को कैसे पहचानता। उसने उत्तर दिया भाई मैं ठहरा बूढ़ा आदमी यह थैला भारी है। इसे ले जाने में कठिनाई है। इसलिए बैठा हूं। महाराजा ने कहा परेशानी की कोई बात नहीं है आप मुझे अपने घर का रास्ता बता दे मैं यह थैला आपके घर पहुंचा देता हूं।

भिखारी वेष धारी महाराजा रणजीत सिंह ने वह थैला अपने कंधों पर लादकर खुशी-खुशी वृद्धि के घर तक पहुंचा दिया इस कार्य में उन्हें तनिक भी संकोच या लज्जा का अनुभव नहीं हुआ।

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इनाम

लोग आज थप्पड़ के बदले घुसा, कंकड़ के बदले पत्थर मारकर बदला चुकाते हैं।लेकिन महान व्यक्तियों का तो स्वभाव ही अनोखा होता है।
एक बार महाराजा रणजीत सिंह अपने सैनिकों के साथ एक बाग के पास से गुजर रहे थे अचानक एक पत्थर का टुकड़ा महाराज के सर पर आकर लगा।
खून बहने लगा महाराजा ने कुछ चिंता ने की सैनिक अपराधी को पकड़ने के लिए सब और फुर्ती से दौड़े और थोड़ी ही देर में अपराधी को पकड़कर महाराज के सामने पेश कर दिया गया अपराधी भी भला कौन एक बालक।
तो क्या महाराजा अपराधी को देखकर क्रोधित हुए? बिल्कुल नहीं पूछने पर महाराज को पता चला कि कई दिनों का भूखा वह बालक पेड़ पर पत्थर मारकर अपने खाने के लिए फल तोड़ रहा था।
वही पत्थर पास से गुजरते हुए महाराज के लग गया था। तब तो दयालु महाराज रणजीत सिंह ने उस बालक को दंड देने के बजाय पुरस्कार देकर विदा किया।
सभी ने महाराज की उदारता और शमाशीलता की प्रशंसा की, "सचमुच शमा और उदारता तो महान पुरुषों के स्वभाव में बसी होती है"

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400000000 कुर्ते

गांधी जी से मिलने एक बच्चा आया। उसने उन्हें कुर्ता ने पहन ने देखकर पूछा बापू आप कुर्ता क्यों नहीं पहनते? बापू ने उत्तर दिया, "बेटे मेरे पास पैसे कहां है जो कुर्ती सिलवा सकूं"
बच्चे को बापू पर तरस आया वह बोला बापू मेरी मां कपड़े सीलती है। आपके कुर्ते में उनसे सिल्वा कर ला दूंगा बापू बोले बेटे जितने कुर्तों की मुझे आवश्यकता है।
तुम्हारी मां नहीं सिल पाएगी। बच्चे ने आश्चर्य से पूछा क्यों नहीं सिल पाएगी बापू ? आखिर आपको कितने कुत्ते की आवश्यकता है एक, दो या तीन।
बापू ने कुछ सोचा फिर बोले बेटे इस देश में 40 करोड़ लोग हैं उनमें से अधिकांश लोगों के पास कपड़े नहीं है। उन सब के लिए भी तो कुर्ते चाहिए उनके नंगे रहते, भला मैं अकेला कपड़े कैसे पहन सकता हूं।
सारा देश ही तो मेरा परिवार है। ऐसे थे बापू जब देश की अधिकांश जनता को पहनने के लिए कपड़े ने मिलते हो तो वे अकेले कपड़े कैसे पहन सकते थे।
जनता के सुख-दुख को भी अपना सुख दुख समझते थे। ऐसे थे हमारे बापू।
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एक कटोरी पानी और सोई

तमिलनाडु के संत कवि तिरुवल्लुवर के बारे में प्रसिद्ध है। कि जब वो भोजन करने बैठते तो अपनी पत्नी से एक कटोरी में साफ पानी और एक सोई अपने पास रखवा लेते थे।
कोई नहीं जानता था वो ऐसा क्यों करते थे। जब पत्नी का अंतिम समय आया तो उसने अपने पति से कहा स्वामी अब मेरा अंतिम समय है।
मैं आपसे एक बात पूछती हूं आप भोजन के समय प्रतिदिन एक कटोरी पानी और एक सोई अपने पास रख लेते थे इसका क्या रहस्य था।
मैं जीवन भर न जान सकी। क्या आप मुझे यह रहस्य बताएंगे ? तिरुवल्लुवर बोले मैं भोजन के समय सुई और पानी इसलिए पास रखता था।
कि यदि खाते समय अन्य का एक दाना भी नीचे गिरे तो उसे सुई से उठाकर पानी में साफ करके खा लू। भोजन का एक कण भी क्यों बेकार जाए।
पर तुम हमेशा इतनी सावधानी से खाना परोस देती थी कि कभी भी भोजन का एक कण नीचे नहीं गिरने देती थी।

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श्री कृष्ण द्वारा अतिथि सत्कार

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया दूर-दूर देशों से राजा, महाराजा, ऋषि-मुनियों को इस समारोह में बुलाया गया। सब कौरव पांडव और संगे संबंधियों को अलग-अलग काम सौंप दिए गए।
सबसे बाद में आए श्री कृष्ण उन्होंने कहा मुझे भी काम बताइए। युधिष्ठिर बोले सब काम शॉप पर जा चुके थे। आप विश्राम कीजिए।
उन दिनों घर पर आने वाले अतिथियों के पैर धोकर अतिथि सत्कार करने की प्रथा थी श्रीकृष्ण ने देखा कि अतिथियों के पैरों धोकर सत्कार करने की रीत थी
ये काम अभी किसी को नहीं सौंपा गया है अब श्री कृष्ण बैठे ना रहे सके युधिष्ठिर के मना करने पर भी उन्होंने अतिथियों के पैर धोकर सत्कार करने का काम संभाल लिया।
इस काम को उन्होंने छोटा नहीं माना, नहीं इससे करने में किसी प्रकार की लजा नहीं की। सचमुच बुरे काम तो बुरे होते हैं पर अन्य कोई भी अच्छा काम छोटा या बड़ा नहीं होता इन्हें करते हुए संकोच नहीं करना चाहिए।


कहानी पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया , आपका दिन शुभ हो।


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