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अंधेरे को रोशनी से ही मिटा सकते हैं, new story in hindi, short story in hindi,

आपका स्वागत है। इसमें मैं आपके लिए एक नई story लाया हूं। आशा करता हूं। आपको पसंद आएगी। 

आधी रात का समय था। सब तरफ गहरा अंधेरा था। तभी एक चोर चुपके से एक सेठ के घर में घुसा। घर के सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे। चोर ने चुपचाप बहुत से सामान की गठरी बांधी और तेजी से चल दिया। अचानक जल्दबाजी में गठरी उसके सिर से नीचे गिर गई। धड़ाम की आवाज हुई। घर के सब लोग जाग गए। सब और "चोर,चोर" का शोर सुनाई पड़ने लगा।
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चोर अपनी जान बचाकर भागा। बहुत से लोग उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागे। चोर दौड़ते-दौड़ते बस्ती से बाहर आ गया। तभी अचानक आकाश में बादल गरजने लगे। घनघोर वर्षा होने लगी। लेकिन चोर भागता ही रहा। वर्षा के कारण पीछा करने वाले लोग बहुत पीछे छूट गए।
कड़ाके की सर्दी थी। ऊपर से वर्षा हो गई। ठंडी ठंडी तेज हवाएं चलने लगी। चोर वर्षा में भीग कर थर-थर कांप रहा था। ठंड और थकान के कारण दो कदम चलना भी उसके लिए कठिन था। वह सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तलाश करने लगा।

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तभी उसे सामने एक झोपड़ी दिखाई दी। झोपड़ी में एक साधु रहते थे। चोर ने झोपड़ी के द्वार पर आवाज दी।श्रीमान जी मैं रास्ता भटक गया हूं। बीमार हूं। क्या आप मुझे रात भर के लिए अपने यहां ठहरने देंगे।
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आवाज सुनकर साधु कुटिया से बाहर आए। वह बड़े प्रेम से उसे भीतर ले गए। उसे सूखे कपड़े दिए साधु स्वयं जमीन पर लेटे और अपने बिस्तर पर उस चोर को सुला दिया।
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साधु को थोड़ी देर बाद नींद आ गई लेकिन चोर जागता रहा। बाहर बरसात थम गई थी। चोर चुपके से उठा उसने कुटिया के सामान पर एक नजर डाली। पीतल की एक साफ़ बाल्टी अंधेरे में भी चमक रही थी।
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चोर ने मन ही मन सोचा। बाल्टी ही क्या बुरी है? इसे बेचकर ₹50 आराम से मिल जाएंगे।
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उसने चुपचाप बाल्टी उठाई और झोपड़ी से बाहर आ गया। बस्ती की ओर से अब कोई आवाज नहीं आ रही थी। चोर ने मन ही मन सोचा अब कोई भय नहीं है। बस्ती में सब सोए हुए हैं। उधर ही चलो।
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थोड़ी देर बाद वह बस्ती में पहुंच गया। वह सोचने लगा मैं साधु के गुरु के कपड़े पहने हुए हूं। लोग मुझे साधु समझेंगे। कोई पहचान नहीं पाएगा कि मैं चोर हूं।
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तभी ही गस्त करते हुए 2 सिपाही उधर आ निकले। एक सिपाही ने उसे दूर से ही कड़ककर पूछा। कौन?
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चोर ने सोचा कि सिपाहियों ने उसे पहचान लिया है। वह सिर पर पैर रख कर भागा। सिपाहियों को उस पर पूरा संदेह हो गया। दोनों सिपाही उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़े। सब तरफ से चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो का शोर मच गया। शीघ्र ही चोर पकड़ लिया गया।
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चोर को थाने ले जाया गया। पुलिस ने जब उस से डांट कर पूछा। तो उसने सब बातें सच सच बता दी। दरोगा ने साधु के पास जाकर पूछा क्या यह बाल्टी आपकी है?

जी हां साधु ने उत्तर दिया।

चोर का कलेजा धक-धक करने लगा। उसे पक्का विश्वास हो गया कि अब उसे चोरी के अपराध के कारण जेल काटनी पड़ेगी।
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दरोगा ने साधु से कहा इस आदमी ने आपके यहां से यह बाल्टी चुराई है। यह चोर है। इसे कड़ी सजा मिलेगी।

नहीं, साधु ने शांत भाव से कहा। यह बाल्टी मैंने इसे भेंट में दी है। इसका कोई अपराध नहीं है। इसे छोड़ दीजिए।

साधु की बात सुनकर चोर को बड़ा आश्चर्य हुआ। साधु से ऐसी बातों की उसे आशा न थी। अब तो चोर को अपनी करनी पर पछतावा होने लगा। वह अपने अपराध पर फूट-फूट कर रोने लगा। उसने दौड़कर साधु के पैर पकड़ लिए और बोला मैं पापी हूं। मुझे दंड दीजिए।

साधु ने शांत भाव से उसके सिर पर हाथ रखा और कहा तुम्हें अपनी गलती पर पछतावा है। इतना ही बहुत है। जाओ भले लोगों की तरह जीवन बिताओ। 

चोर उस दिन से चोरी करना छोड़ दिया। वह मजदूरी करके भले लोगों की तरह जीवन बिताने लगा।

सचमुच बुरे उपायो से बुराई को नहीं मिटाया जा सकता। भले लोगों के अच्छे आचरण से दुष्टों के भी मन बदल जाते हैं।

तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है।
            "सट सुधीर ही सत्संगति पाई"
अर्थात अच्छे लोगों का संघ पाकर दुष्ट लोग भी सुधर जाते हैं। वे दुष्टता छोड़कर भले व्यक्ति बन जाते हैं। हमें अपने श्रेष्ठ आचरण के द्वारा दुष्ट लोगो को भी सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए


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