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लल्लू जी का पजामा new hindi story, short hindi story

A NEW HINDI STORY

हेलो दोस्तों स्वागत है। आपका इस नई कहानी में।

एक शहर में रहते थे। 'लल्लू', वे अपने को बड़ा ज्ञानी समझते थे। लोगों से बात कहते, तो उन्हें बार बार समझाते। उनका विश्वास था। कि बार-बार कहने से ही बात का पूरा असर होता है। उन्हें लगता था। एक आधा बार कही हुई बात को तो लोग यूं ही टाल देते है।
 लल्लू जी लंबे चौड़े व्यक्ति थे। एक बार उन्होंने अपना पजामा सिलने के लिए कपड़ा दर्जी को दिया। दर्जी के दिमाग में लल्लू जी की लंबाई का सिक्का बैठा हुआ था। इसलिए उसने लल्लू जी का नाप लिए बिना ही पजामा सिल दिया। लेकिन अबकी बार उसने जो नया पजामा सिला। वह 4 अंगुल नीचा हो गया। पजामा सील कर भी महीनों बाद दिया।
लल्लू जी ने पजामा पहन कर देखा तो बड़े परेशान हुए। उन्होंने सोचा कि इससे दर्जी को ठीक करने को दूंगा तो यह है। फिर महीने बाद वापस देगा इतना काम तो घर पर भी कराया जा सकता है।
लल्लू जी बाहर जाने से पहले अपनी बीवी से बोले। "सुल्ताना की अम्मी" सुनती हो दर्जी ने मेरा पजामा बहुत लंबा कर दिया है। इसे काट कर चार अंगुल छोटा कर देना।
लल्लू जी के दिमाग में आया कि उनकी बीवी तो 2 मिनट में ही बात को भूल जाती है। उन्हें बरामदे में बड़े बेटे की बहू दिखाई दी। बहु सुनो, तुम्हारी मम्मी तो ठहरी भुलक्कड़ मेरा नया पजामा काटकर चार अंगुल छोटा कर देना। भूलना मत।
यह कहकर लल्लू जी आंगन में आए तो छोटी बहू और बेटी काम करती दिखाई दी। तभी लल्लू जी ने सोचा बड़ी बहू को तो अपने बच्चों का बहुत काम रहता है। उसे वक्त मिलना मुश्किल है। इसलिए छोटी बहू और बेटी को यह काम शॉपना ठीक रहेगा। छोटी बहू और बेटी से बोले देखो छोटी बहू और बेटी सकीना तुम दोनों से कहे जाता हूं। दर्जी ने मेरा पजामा बहुत नीचा बना दिया है। इसे काट कर चार अंगुल छोटा कर देना।
अब कल्लू जी निश्चिंत होकर दिन भर के लिए बाहर चले गए।
थोड़ी देर बाद लल्लू जी की बीवी को अपने पति का फरमान याद आया। उसने झट से चार अंगुल कपड़ा काटकर पजामा छोटा कर दिया। और संभाल कर उसे अलमारी में रख दिया।
कुछ देर बाद बड़ी बहू को फुर्सत हुई। वह पजामा उठा कर अपने कमरे में ले आई और काट कर चार अंगुल छोटा कर दिया। फिर पजामा संभाल कर उसी अलमारी में वापस रख आई।
छोटी बहू को याद आया। तो उसने भी पजामा काटकर चार अंगुल छोटा कर दिया और वापस अलमारी में रख दिया।
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1 घंटे बाद बेटी को ध्यान आया कि अब्बा जान का पजामा ठीक करना है। उसने भी चार अंगुल कपड़ा काट डाला और सिलाई करने लगी।

लल्लू जी बाहर से लौटे। उन्होंने बेटी को पजामा ठीक करते देखा। बड़े खुश हुए। मन ही मन बोले- सचमुच बिटिया ही बाप का ध्यान रखती है। बेटी ने सिलाई पूरी की और पजामा अपने अब्बा जान को दे दिया। उसे लेकर बड़े चाव से अपने कमरे में पहुंचे तुरंत कपड़े उतारे और उसे पहन कर देखा।

लेकिन पजामा पहनते ही लल्लू जी ने अपना सिर पीट लिया। वे जोर-जोर से चीखने लगे। 'सुनो'-सुल्ताना की अम्मी, बड़ी बहू, छोटी बहू, सकीना यह क्या कर डाला तुम सब ने। अरे जरा आकर तो देखो, अपनी फूटी आंखों से-" मैं लल्लू हूं या सर्कस का जोकर" । दर्जी ने मेरा नाश किया लेकिन तुम सब ने मिलकर मेरा सत्यानाश कर डाला।
लल्लू जी का चीलाना सुनकर तो सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। उनका नए फैशन का पजामा देख कर सब लोग ठहाके लगाकर हंसने लगे हैं। शरारती बच्चे तो खुशी हो कर उछलने कूदने लगे। लल्लू जी मन ही मन जल-भूनकर रह गए। पर तब से उन्होंने किसी काम को बार-बार कहने की आदत छोड़ दी।

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