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नीम का पेड़ hindi story

हेलो दोस्तों, कैसे हैं आप ? आज मैं आपके लिए एक नई कहानी लेकर आया हूं। इस कहानी को पढ़कर आप अपने बच्चे को पेड़ों के विषय में अच्छी जानकारी दे सकते हैं।आशा करता हूं। यह कहानी आपको पसंद आएगी। 
ग्रीष्मावकाश के दिन थे। दीपक अपने घर के
पास नीम के पेड़ की छाया में बैठा हुआ
कहानियों की पुस्तक पढ़ रहा था। पढ़ते
पढ़ते उसे कुछ नींद आने लगी।

तभी उसे लगा कि कोई हँस रहा है। उसने सब ओर देखा, पर वहाँ कोई न था।
तभी आवाज़ सुनाई दी- “दीपक, कहानियाँ पढ़ रहे हो ? लगता है, तुम्हें कहानियाँ बहुत
अच्छी लगती हैं। पर झूठी कहानी पढ़ने से क्या? मैं नीम हूं। लो, मेरी कहानी सुनो। 
सच्ची कहानी।
'तो यह नीम की आवाज़ थी' दीपक ने मन-ही-मन सोचा और कहा, "हाँ, मुझे कहानियाँ
बहुत अच्छी लगती है। चलो, तुम्हीं अपनी कहानी सुनाओ।" ।
*सुनो, फिर ध्यान से मेरी कहानी। ऐसा न हो कि बीच में ही फिर कहानी की किताब पढने
लगो। बीसों वर्ष पुरानी बात है। कुछ दूर जंगल में नीम का एक बड़ा पेड़ था। उस पर बहुत
सारे कौए घोंसले बनाकर रहते थे। तब बरसात के दिन थे। नीम पीली-पीली, पकी-पकी
निबौलियों से लदा था। कौए नीम पर बैठे-बैठे मीठी-मीठी निबौलियाँ तोड़कर धीरे-धीरे
चुभलाते रहते थे।

एक दिन एक कौए ने मीठी निबौली चोंच में ली और मौज में उड़ लिया। मीठी निबौली
चुभलाते-चुभलाते उड़ना उसे बहुत अच्छा लगा। उड़ता-उड़ता वह बहुत दूर निकल आया।

निबौली का मीठा गूदा खाकर कौए ने कड़वी गुठली नीचे गिरा दी। गुठली कीचड़ में गिरी।
उफ ! कितनी गंदी कीचड़ थी वह। पर चार-पाँच दिन बाद ही एक चमत्कार हुआ। उस गंदी
कीचड़ में दबी हुई गुठली में से निकलकर एक नन्हा-सा पौधा ऊपर सिर तानकर खड़ा हो
गया। वह पौधा मैं ही तो था। वह गुठली ही मेरी माता थी।

तुम इस समय मेरा वह बाल रूप देखते, तो मुझे पहचान न पाते। वह गृठली तो मुझे :
जन्म देकर गल-सड़कर मिट्टी में मिल गई। अब बिना माँ के मुझे कौन सहारा देता ? धरती माँ को
दया आई। वह मुझे खुराक देने लगी। हवा बड़े प्यार से मुझे झूला झुलाने लगी। 
धीरे-धीरे

अब तो मैं बड़ा पेड़ बन गया हूँ
सिर पर सहता हूँ। दूसरों को ठंडी हवा देता हूं
मेरी छाल को पीसकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से  फोड़े-फुंसी ठीक हो जाते हैं
किसी से कम नहीं हूँ। 
दूसरों के लिए स्वच्छ हवा का भी प्रबंध करता हूं
खुले आकाश के नीचे खड़े-खड़े मैंने खूब कष्ट भी भोगे। गरमी आती। गरम तेज़ हवा
चलतीं। मेरे सिर पर सूरज गरम तवे की तरह तपता। मेरा शरीर गरमी में झलसता रहता। 
दीपक, तुम तो धूप-गरमी लगने पर ठंडी छाया में जाकर बैठ जाते हो। पर में क्या करता ) मेरे
पैर तो है नहीं, जो चलकर छाया में बैठ जाता। वहीं धूप में खड़ा-खड़ा तपता रहता था।
पर दु:ख सदा नहीं रहता। एक दिन मेरे कष्टों का भी अंत हुआ। मैंने देखा, आकाश काले
काले बादलों से ढक गया। ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी। तभी बादलों से पानी बरसा। मैं जी
भरकर नहाना। तन मिट गई। खूब मज़ा आया।
कभी-कभी कोई पशु भी मेरी हरियाली देखकर मुझे खाने को लपकता पर मुझे दूर से ही
सूंघकर हट जाता। फिर मेरे पास फटकने का नाम ना लेता। मैं मन-ही-मन यह सोचकर खुश
होता कि कड़वापन भी कितनी अच्छी चीज़ है! कड़वे होने के कारण ही जान बच जाती है।
कुछ दिन बाद सरदी पड़ने लगी। बर्फीली हवा चलने लगी। सब लोग घरों में दुबककर
लिहाफ़ ओढ़कर सोने लगे। पर मेरा घर कहाँ था ? खुले आसमान के नीचे। वहीं जाड़े पाले में
खड़ा-खड़ा ठिठुरता रहता था। कुछ दिन बड़ा कष्ट रहा। पर थोड़े दिन बाद यह संकट भी दूर
हो गया। समय बीतने के साथ-साथ मुझे बदलते मौसम का अभ्यास हो गया। अब मौसम
बदलते तो एक अलग ही आनंद आता।

दिन, मास और वर्ष बीतते गए। मेरी शाखाएँ चारों ओर दूर-दूर तक फैलती रहीं। मेरी छाया
घनी होती गई। धूप-गरमी से परेशान लोग मेरी छाया में बैठने लगे। बरसात में सब लोग मेरी
मीठी-मीठी निबौलियाँ चखने लगे। कुछ लोग मेरे कोमल-कोमल अंगों को तोड़ते और उनकी
दातौन करते। मुझे कष्ट तो होता पर दूसरों की सेवा करने में आनंद भी अनुभव होता था।
अब तो मैं बड़ा पेड़ बन गया मेरी घनी शाखाएँ दूर-दूर तक फैल गई हैं। मैं धूप अपने
सिर पर सहता हूँ। दूसरों को ठंडी छाया देता हूँ। मेरे पत्ते कीटाणु नष्ट करने के काम आते हैं।
मेरी छाल को घिसकर फोड़े-फुंसियों पर लगाया जाता है। मैं कड़वा तो अवश्य पर गुणों में
किसी से कम नहीं हूँ। दूसरे पेड़ों की तरह मैं भी विषैली हवा (कार्बन डाइऑक्साइड) सोख
लेता हूँ और जीवों के लिए उपयोगी प्राण-वायु सबको दे देता हूँ। मेरा जीवन दूसरों के लिए है।


फिर भी कुछ मूर्ख लोग मुझे चोट पहुँचाते रहते हैं। तुम्हें मेरी कहानी पसंद आई न दीपक
भैया!''

“हाँ, हाँ बहुत सुंदर कहानी है।'' दीपक प्रसन्न होकर बोला। तभी दीपक ने अपनी आँखें
मलीं। फिर वह देर तक सोचता रहा कि नीम सचमुच हमारे लिए कितना अधिक उपयोगी
है !

पढ़ते रहे। बढ़ते रहे। 

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